Friday, 29 July 2016

इरोम...लोकतंत्र की हार या जीत

सोलह बरस लंबे अनशन को अचानक समाप्त करने की घोषणा कर इरोम ने सभी को हैरत में डाल दिया. उन्होंने सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन अपना संघर्ष आगे बढ़ाने की बात कही है. इरोम शर्मीला ने कहा, 'पिछले 16 सालों में किसी सत्ता या राजनीतिक शक्ति ने उनकी लड़ाई को आगे नहीं बढ़ाया. ना ही आफ्सपा हटाने की मांग उठाई, इसलिए वह 2017 का मणिपुर विधानसभा चुनाव में लड़ेंगी.' उनके फैसले ने सरकार को राहत ही दी है, क्योंकि इरोम को जिंदा रखना सरकार के लिए कम चुनौती नहीं था. लेकिन इस फैसले ने लोकतंत्र में जनता की मांग को लेकर सरकार के रवैये, अहिंसात्मक आन्दोलन के प्रति उसकी गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
चित्र साभार

मणिपुर की एक सामान्य सी लड़की जब आफ्सपा (सशस्त्र बल विशेष शक्ति) के विरोध में अनशन पर बैठी होगी, तो शायद ही किसी ने सोचा हो कि उसका यह संकल्प 16 साल लंबा चलेगा. इरोम के इस अभूतपूर्व कदम ने उन्हें दुनिया में ' आयरन लेडी' के नाम से मशहूर कर दिया, किन्तु सरकार को इस जनविरोधी कानून पर पुनर्विचार के लिए राजी नहीं कर पाई. हालांकि, आफ्सपा को हटाने की बात करने वालों के अपने तर्क हैं और सरकार के पास हिमायत की अपनी वजह. सरकार अपनी बात से डिगने को तैयार नहीं थी, सो इरोम भी बड़े ही सालीन तरीके से सरकार को समझाने का प्रयास करतीं रहीं. ना ही सरकर डिग रही थी, ना इरोम का साहस डिगा. फिर अचानक यह फैसला सवाल उठता है कि क्या इरोम ने मान लिया की आफ्सपा से आज़ादी के लिए उन्हें राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बनाना पड़ेगा? क्या सचमुच अब हमारा लोकतंत्र वहां पहुंच गया है, जहां अपनी बात रखने के लिए राजनीतिक सिस्टम का हिस्सा बनाना ही एकमात्र विकल्प बचा है. वर्तमान में जम्मू-कश्मीर से लेकर दलितों की समस्या तक कई छोटे-बड़े मुद्दे अपना सर उठा रहे हैं, तो क्या उनके समाधान का भी रास्ता राजनीतिक गलियारे से होकर ही गुजरता है? लेकिन, यदि यही एकमात्र विकल्प होता, तो लोकपाल के हथियार से भ्रष्टाचार को उखाड़ फैंकने की मंशा से राजनीति में प्रवेश करने वाली आम आदमी पार्टी आज खुद कठघरे में खड़ी ना होती! केजरीवाल को दिल्ली का सिंहासन मिलने के बाद भी लोकपाल का सवाल ज्यो का त्यों बना हुआ है, सत्ता में आने के वर्ष भर के भीतर ही 'आप' के दर्जन भर विधायक जेल हो आए. आज भी दिल्ली में नित नए खुलासों का दौर जारी है. इतना ही नहीं कांग्रेस के भ्रष्टाचारों की बखियां उधेड़ने वाले मोदी कैबिनेट के 24 मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. शिवपाल यादव की चिट्ठी पर नियुक्ति को लेकर स्वयं मोदी घिरे हुए हैं. ऐसे में, यदि इरोम ने चुनाव जीत भी लिया तो वे मणिपुर से आफ्सपा हटाने में कितनी कामयाब हो पाएंगी, यह तो वक्त ही बताएगा.
फिलहाल, इरोम के फैसले ने अहिंसात्मक आंदोलन हो या संघर्ष का रास्ता अपनाने वाली जनता दोनों को ही सरकार कितनी गंभीरता से लेती है इस पर सोचने को मज़बूर कर दिया है. साथ ही इरोम का यह कदम तथाकथित बुद्धिजीवियों के समक्ष यह यक्ष प्रश्न भी खड़ा करता है कि मौजूदा वक्त में 'लोक' सर्वोपरि है या सरकार ही अब सबकुछ बनकर रह गई है! क्या जनता के चुने प्रतिनिधि अब सिर्फ अपने सिस्टम में शामिल लोगों की ही सुनते हैं! हालांकि, "आप" की सियासत समझने की कोशिश करें, तो इस सच की अनदेखी नहीं की जा सकतीकि राजनीतिक सिस्टम का हिस्सा बनने के बाद सभी एक सा वर्ताव करने लगते हैं. खैर, सच चाहे जो भी हो, इरोम का अनशन समाप्ति का फैसला स्वागत योग्य है और लोकतंत्र की हार- जीत से इतर उनका संघर्ष अभिनंदनीय है. 'आयरन लेडी' के जज्बे को सलाम.

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