Tuesday, 2 August 2016

आनंदीबेन का इस्तीफा, स्वेच्छा या मजबूरी!

गुजरात की सियासत में सोमवार का दिन काफी नाटकीय रहा, जब राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री आनदीबेन पटेल ने फेसबुक स्टेटस के जरिये अपने इस्तीफे की पेशकश की. उनके इस अपडेट के साथ ही सक्रिय राजनीति से उनकी विदाई हो गई और गुजरात में पिछले कई दिनों से चल रहे राजनीतिक पटापेक्ष का भी अंत हो गया. हालांकि, सीएम बदलने से राज्य में स्थितियां कितना बदलेगी, आनंदीबेन के कार्यकाल के दौरान हुए पॉलिटिकल डैमेज को भरने में बीजेपी को कितनी कसरत करनी पड़ेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. फिलहाल, बढ़ती उम्र की दुहाई दे कर आनंदीबेन ने गुजरात की गद्दी से खुद को अलग कर लिया है.

खैर, पटेल आंदोलन को लेकर राजनीतिक भद कराने के बाद ऊना की वर्तमान घटना से यह बात ढंकी-छिपी नहीं रही कि आनंदीबेन से चीजें संभल नहीं रही हैं. वैसे भी, पटेल समुदाय को समझा-बुझाकर फिर से अपने पाले में कर लेना बीजेपी के लिए उतना मुश्किल भी नहीं था. लेकिन दलितों के गुस्से ने बीजेपी खेमे में बेचैनी पैदा कर दी, जबकि गुजरात में दलित बीजेपी वोटर भी नहीं है. फिर ऐसा क्या हुआ कि आनंदीबेन को कुर्सी छोड़नी पड़ी?
जानकारों का मानना है कि बात यहाँ सिर्फ मुख्यमंत्री बदलने की नहीं है, दलितों के शक्ति प्रदर्शन से बीजेपी खेमे में घबराहट है और सवाल देशभर की राजनीति का बन गया है. चिंता का विषय भी है, क्योंकि ऊना की घटना से नाराज़ दलितों में पहली बार ऐसा गुस्सा दिखा. गौ रक्षा के हिंसक और भावनात्मक सवालो का जवाब जिस तरह गुजरात के दलितों ने दिया, उस तरह शेष भारत के दलित नेताओं को सूझा तक नहीं. रोहित वेमुला की घटना के बाद दलितों में आए उबाल को बीजेपी ने बड़ी मुश्किल से शांत किया था, लेकिन ऊना की घटना से सब पर पानी फिर गया. यूपी चुनाव करीब होने के कारण रोहित वेमुला की घटना से इतर इस बार मायावती भी ज्यादा आक्रामक दिख रही हैं. इतना ही नहीं ऊना की घटना क बाद दिल्ली में अनुसूचित और जनजाति फोरम के 160 सांसदों ने बैठक कर प्रधानमंत्री को साफ संदेश दिया है कि ऐसी घटनाएं बर्दास्त नहीं की जाएंगी. खास बात यह है कि इनमेँ बीजेपी के संसद भी हैं, जिन्होंने दलगत  भावना से ऊपर उठकर गुजरात के दलितों का समर्थन किया है. यानी गुजरात के बहाने देशभर और खासकर यूपी के आगामी चुनाव को संभालने की कोशिश की जा रही है.
वैसे भी, गुजरात में दलित वोट सिर्फ सात फीसद है, जो पहले से ही बीजेपी के वोटर नहीं है और आंदोलन भी गुजरात में कोई नई बात न है. 1956 में महागुजरात आंदोलन, 1974 में छात्रों का नवनिर्माण आंदोलन,1975 में इमरजेंसी, 1981 में आरक्षण के विरोध और समर्थन में हुए आंदोलन से लेकर 1985 के आरक्षण जैसे आंदोलन राज्य में समय-समय पर होते रहते हैं. इसलिए आनंदीबेन के इस्तीफे के पीछे सिर्फ गुजरात की राजनीति साधना नहीं है, बल्कि सवाल देश की राजनीति का भी है. वैसे भी, आनंदीबेन को सत्ता देने का फैसला स्वयं प्रधानमंत्री का था, जिसमें अन्य की सहमति कम ही झलकती है. अमित शाह के साथ आनंदीबेन के संबंध बेहतर नहीं थे, ना वे अच्छी ऑर्गनाइजर रही है. जानकारों की मानें, तो उनके जीत का अंतर भी कभी ज्यादा नहीं रहा, तभी आनंदीबेन अपनी विधानसभा सीट भी बदलती रहीं. विधायकों का समर्थन भी उनके साथ नहीं रहा. उस पर सत्ता संभालने के बाद राज्य के हालात ने उनकी भद कर दी. हालांकि, प्रधानमंत्री की सहमति के बिना उन्होंने यह कदम उठाया हो यह कहना मुश्किल होगा और इस सच को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि आनंदीबेन एवं गुजरात को लेकर चर्चाओं का बाजार काफी समय से गरम था.
आखिरकार, आनंदीबेन के फेसबुक अपडेट और उसपर अमित शाह की स्वीकृति के साथ इस सियासी ड्रामे का अंत हो गया.