दलितों पर अत्याचार कोई नई बात नहीं है, नया है उनके विरोध का तरीका. ऊना ( गुजरात) की घटना का वहां के दलितों ने जिस तरीके से विरोध किया, उससे ना सिर्फ दिल्ली की चूलें हिल गईं, बल्कि पहली बार लगा कि दलित और अत्याचार सहने को तैयार नहीं है. परिणास्वरूप ऐसी घटनाओं पर चुप्पी साधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तल्ख होकर अपने ही सहयोगियों के फैलाए तामझाम पर तंज कसना पड़ा. आनन-फानन में "गौ रक्षा" की आड़ में अवांछनीय कार्यों में लिप्त लोगों पर सख्त कार्रवाई की गुजारिश तक पीएम ने राज्य सरकारोँ से कर डाली. हालांकि, प्रधानमंत्री की बात का कितना असर होगा, या हालात कितने बदलेंगे इन सबसे इतर सवाल यह है कि प्रधानमंत्री को अचानक दलितों की पीड़ा का अहसास कैसे हुआ? क्या ताज़ा घटना गुजरात से जुड़ी थी, इसलिए वहां की सीएम को सत्ता से बेदखल करने तक के ठोस कदम उठाए गए या बात यूपी के नजदीकी विधानसभा चुनाव की है. क्योंकि, सियासत गवाह है कि देश चलाने वालों को चुनावी आवो-हवा में जनता के दर्द- जरूरतों का आभास होता है, फिर मुद्दा चाहे बुलंदशहर में रेप का हो, दलितों पर हो रहे अत्याचार का. सभी दल अपने-अपने तरीके से चुनावी साध पूरी करने की जुगत में लग जाते हैं. तो यूपी विधानसभा की आहट से पहले कश्मीर, दलित जैसे मुद्दे हवा तैर रहे हैं, जिसकी धमक संसद से लेकर सड़क तक सुनाई दे रही है और यकीन मानिए चुनाव हो जाने तक इस तरह के कई मुद्दे उठेंगे और बहस का बाजार गर्म रहेगा.
Political अड्डा
जिंदगी की आपाधापी के बीच अपने आसपास की गतिविधियों को देखने, सुनने, समझने, परखने और उनके समानांतर पहलुओं को महसूस करने का वक्त खंगालना मुश्किल है। फिर भी, यह कोशिश कि क्यों न कुछ वक्त चुरा लिया जाए, यही इस ब्लॉग की उपलब्धि है।
Thursday, 11 August 2016
Tuesday, 2 August 2016
आनंदीबेन का इस्तीफा, स्वेच्छा या मजबूरी!
गुजरात की सियासत में सोमवार का दिन काफी नाटकीय रहा, जब राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री आनदीबेन पटेल ने फेसबुक स्टेटस के जरिये अपने इस्तीफे की पेशकश की. उनके इस अपडेट के साथ ही सक्रिय राजनीति से उनकी विदाई हो गई और गुजरात में पिछले कई दिनों से चल रहे राजनीतिक पटापेक्ष का भी अंत हो गया. हालांकि, सीएम बदलने से राज्य में स्थितियां कितना बदलेगी, आनंदीबेन के कार्यकाल के दौरान हुए पॉलिटिकल डैमेज को भरने में बीजेपी को कितनी कसरत करनी पड़ेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. फिलहाल, बढ़ती उम्र की दुहाई दे कर आनंदीबेन ने गुजरात की गद्दी से खुद को अलग कर लिया है.
खैर, पटेल आंदोलन को लेकर राजनीतिक भद कराने के बाद ऊना की वर्तमान घटना से यह बात ढंकी-छिपी नहीं रही कि आनंदीबेन से चीजें संभल नहीं रही हैं. वैसे भी, पटेल समुदाय को समझा-बुझाकर फिर से अपने पाले में कर लेना बीजेपी के लिए उतना मुश्किल भी नहीं था. लेकिन दलितों के गुस्से ने बीजेपी खेमे में बेचैनी पैदा कर दी, जबकि गुजरात में दलित बीजेपी वोटर भी नहीं है. फिर ऐसा क्या हुआ कि आनंदीबेन को कुर्सी छोड़नी पड़ी?
खैर, पटेल आंदोलन को लेकर राजनीतिक भद कराने के बाद ऊना की वर्तमान घटना से यह बात ढंकी-छिपी नहीं रही कि आनंदीबेन से चीजें संभल नहीं रही हैं. वैसे भी, पटेल समुदाय को समझा-बुझाकर फिर से अपने पाले में कर लेना बीजेपी के लिए उतना मुश्किल भी नहीं था. लेकिन दलितों के गुस्से ने बीजेपी खेमे में बेचैनी पैदा कर दी, जबकि गुजरात में दलित बीजेपी वोटर भी नहीं है. फिर ऐसा क्या हुआ कि आनंदीबेन को कुर्सी छोड़नी पड़ी?
जानकारों का मानना है कि बात यहाँ सिर्फ मुख्यमंत्री बदलने की नहीं है, दलितों के शक्ति प्रदर्शन से बीजेपी खेमे में घबराहट है और सवाल देशभर की राजनीति का बन गया है. चिंता का विषय भी है, क्योंकि ऊना की घटना से नाराज़ दलितों में पहली बार ऐसा गुस्सा दिखा. गौ रक्षा के हिंसक और भावनात्मक सवालो का जवाब जिस तरह गुजरात के दलितों ने दिया, उस तरह शेष भारत के दलित नेताओं को सूझा तक नहीं. रोहित वेमुला की घटना के बाद दलितों में आए उबाल को बीजेपी ने बड़ी मुश्किल से शांत किया था, लेकिन ऊना की घटना से सब पर पानी फिर गया. यूपी चुनाव करीब होने के कारण रोहित वेमुला की घटना से इतर इस बार मायावती भी ज्यादा आक्रामक दिख रही हैं. इतना ही नहीं ऊना की घटना क बाद दिल्ली में अनुसूचित और जनजाति फोरम के 160 सांसदों ने बैठक कर प्रधानमंत्री को साफ संदेश दिया है कि ऐसी घटनाएं बर्दास्त नहीं की जाएंगी. खास बात यह है कि इनमेँ बीजेपी के संसद भी हैं, जिन्होंने दलगत भावना से ऊपर उठकर गुजरात के दलितों का समर्थन किया है. यानी गुजरात के बहाने देशभर और खासकर यूपी के आगामी चुनाव को संभालने की कोशिश की जा रही है.
वैसे भी, गुजरात में दलित वोट सिर्फ सात फीसद है, जो पहले से ही बीजेपी के वोटर नहीं है और आंदोलन भी गुजरात में कोई नई बात न है. 1956 में महागुजरात आंदोलन, 1974 में छात्रों का नवनिर्माण आंदोलन,1975 में इमरजेंसी, 1981 में आरक्षण के विरोध और समर्थन में हुए आंदोलन से लेकर 1985 के आरक्षण जैसे आंदोलन राज्य में समय-समय पर होते रहते हैं. इसलिए आनंदीबेन के इस्तीफे के पीछे सिर्फ गुजरात की राजनीति साधना नहीं है, बल्कि सवाल देश की राजनीति का भी है. वैसे भी, आनंदीबेन को सत्ता देने का फैसला स्वयं प्रधानमंत्री का था, जिसमें अन्य की सहमति कम ही झलकती है. अमित शाह के साथ आनंदीबेन के संबंध बेहतर नहीं थे, ना वे अच्छी ऑर्गनाइजर रही है. जानकारों की मानें, तो उनके जीत का अंतर भी कभी ज्यादा नहीं रहा, तभी आनंदीबेन अपनी विधानसभा सीट भी बदलती रहीं. विधायकों का समर्थन भी उनके साथ नहीं रहा. उस पर सत्ता संभालने के बाद राज्य के हालात ने उनकी भद कर दी. हालांकि, प्रधानमंत्री की सहमति के बिना उन्होंने यह कदम उठाया हो यह कहना मुश्किल होगा और इस सच को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि आनंदीबेन एवं गुजरात को लेकर चर्चाओं का बाजार काफी समय से गरम था.
आखिरकार, आनंदीबेन के फेसबुक अपडेट और उसपर अमित शाह की स्वीकृति के साथ इस सियासी ड्रामे का अंत हो गया.
आखिरकार, आनंदीबेन के फेसबुक अपडेट और उसपर अमित शाह की स्वीकृति के साथ इस सियासी ड्रामे का अंत हो गया.
Friday, 29 July 2016
इरोम...लोकतंत्र की हार या जीत
सोलह बरस लंबे अनशन को अचानक समाप्त करने की घोषणा कर इरोम ने सभी को हैरत में डाल दिया. उन्होंने सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन अपना संघर्ष आगे बढ़ाने की बात कही है. इरोम शर्मीला ने कहा, 'पिछले 16 सालों में किसी सत्ता या राजनीतिक शक्ति ने उनकी लड़ाई को आगे नहीं बढ़ाया. ना ही आफ्सपा हटाने की मांग उठाई, इसलिए वह 2017 का मणिपुर विधानसभा चुनाव में लड़ेंगी.' उनके फैसले ने सरकार को राहत ही दी है, क्योंकि इरोम को जिंदा रखना सरकार के लिए कम चुनौती नहीं था. लेकिन इस फैसले ने लोकतंत्र में जनता की मांग को लेकर सरकार के रवैये, अहिंसात्मक आन्दोलन के प्रति उसकी गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
मणिपुर की एक सामान्य सी लड़की जब आफ्सपा (सशस्त्र बल विशेष शक्ति) के विरोध में अनशन पर बैठी होगी, तो शायद ही किसी ने सोचा हो कि उसका यह संकल्प 16 साल लंबा चलेगा. इरोम के इस अभूतपूर्व कदम ने उन्हें दुनिया में ' आयरन लेडी' के नाम से मशहूर कर दिया, किन्तु सरकार को इस जनविरोधी कानून पर पुनर्विचार के लिए राजी नहीं कर पाई. हालांकि, आफ्सपा को हटाने की बात करने वालों के अपने तर्क हैं और सरकार के पास हिमायत की अपनी वजह. सरकार अपनी बात से डिगने को तैयार नहीं थी, सो इरोम भी बड़े ही सालीन तरीके से सरकार को समझाने का प्रयास करतीं रहीं. ना ही सरकर डिग रही थी, ना इरोम का साहस डिगा. फिर अचानक यह फैसला सवाल उठता है कि क्या इरोम ने मान लिया की आफ्सपा से आज़ादी के लिए उन्हें राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बनाना पड़ेगा? क्या सचमुच अब हमारा लोकतंत्र वहां पहुंच गया है, जहां अपनी बात रखने के लिए राजनीतिक सिस्टम का हिस्सा बनाना ही एकमात्र विकल्प बचा है. वर्तमान में जम्मू-कश्मीर से लेकर दलितों की समस्या तक कई छोटे-बड़े मुद्दे अपना सर उठा रहे हैं, तो क्या उनके समाधान का भी रास्ता राजनीतिक गलियारे से होकर ही गुजरता है? लेकिन, यदि यही एकमात्र विकल्प होता, तो लोकपाल के हथियार से भ्रष्टाचार को उखाड़ फैंकने की मंशा से राजनीति में प्रवेश करने वाली आम आदमी पार्टी आज खुद कठघरे में खड़ी ना होती! केजरीवाल को दिल्ली का सिंहासन मिलने के बाद भी लोकपाल का सवाल ज्यो का त्यों बना हुआ है, सत्ता में आने के वर्ष भर के भीतर ही 'आप' के दर्जन भर विधायक जेल हो आए. आज भी दिल्ली में नित नए खुलासों का दौर जारी है. इतना ही नहीं कांग्रेस के भ्रष्टाचारों की बखियां उधेड़ने वाले मोदी कैबिनेट के 24 मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. शिवपाल यादव की चिट्ठी पर नियुक्ति को लेकर स्वयं मोदी घिरे हुए हैं. ऐसे में, यदि इरोम ने चुनाव जीत भी लिया तो वे मणिपुर से आफ्सपा हटाने में कितनी कामयाब हो पाएंगी, यह तो वक्त ही बताएगा.
फिलहाल, इरोम के फैसले ने अहिंसात्मक आंदोलन हो या संघर्ष का रास्ता अपनाने वाली जनता दोनों को ही सरकार कितनी गंभीरता से लेती है इस पर सोचने को मज़बूर कर दिया है. साथ ही इरोम का यह कदम तथाकथित बुद्धिजीवियों के समक्ष यह यक्ष प्रश्न भी खड़ा करता है कि मौजूदा वक्त में 'लोक' सर्वोपरि है या सरकार ही अब सबकुछ बनकर रह गई है! क्या जनता के चुने प्रतिनिधि अब सिर्फ अपने सिस्टम में शामिल लोगों की ही सुनते हैं! हालांकि, "आप" की सियासत समझने की कोशिश करें, तो इस सच की अनदेखी नहीं की जा सकतीकि राजनीतिक सिस्टम का हिस्सा बनने के बाद सभी एक सा वर्ताव करने लगते हैं. खैर, सच चाहे जो भी हो, इरोम का अनशन समाप्ति का फैसला स्वागत योग्य है और लोकतंत्र की हार- जीत से इतर उनका संघर्ष अभिनंदनीय है. 'आयरन लेडी' के जज्बे को सलाम.
चित्र साभार
मणिपुर की एक सामान्य सी लड़की जब आफ्सपा (सशस्त्र बल विशेष शक्ति) के विरोध में अनशन पर बैठी होगी, तो शायद ही किसी ने सोचा हो कि उसका यह संकल्प 16 साल लंबा चलेगा. इरोम के इस अभूतपूर्व कदम ने उन्हें दुनिया में ' आयरन लेडी' के नाम से मशहूर कर दिया, किन्तु सरकार को इस जनविरोधी कानून पर पुनर्विचार के लिए राजी नहीं कर पाई. हालांकि, आफ्सपा को हटाने की बात करने वालों के अपने तर्क हैं और सरकार के पास हिमायत की अपनी वजह. सरकार अपनी बात से डिगने को तैयार नहीं थी, सो इरोम भी बड़े ही सालीन तरीके से सरकार को समझाने का प्रयास करतीं रहीं. ना ही सरकर डिग रही थी, ना इरोम का साहस डिगा. फिर अचानक यह फैसला सवाल उठता है कि क्या इरोम ने मान लिया की आफ्सपा से आज़ादी के लिए उन्हें राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बनाना पड़ेगा? क्या सचमुच अब हमारा लोकतंत्र वहां पहुंच गया है, जहां अपनी बात रखने के लिए राजनीतिक सिस्टम का हिस्सा बनाना ही एकमात्र विकल्प बचा है. वर्तमान में जम्मू-कश्मीर से लेकर दलितों की समस्या तक कई छोटे-बड़े मुद्दे अपना सर उठा रहे हैं, तो क्या उनके समाधान का भी रास्ता राजनीतिक गलियारे से होकर ही गुजरता है? लेकिन, यदि यही एकमात्र विकल्प होता, तो लोकपाल के हथियार से भ्रष्टाचार को उखाड़ फैंकने की मंशा से राजनीति में प्रवेश करने वाली आम आदमी पार्टी आज खुद कठघरे में खड़ी ना होती! केजरीवाल को दिल्ली का सिंहासन मिलने के बाद भी लोकपाल का सवाल ज्यो का त्यों बना हुआ है, सत्ता में आने के वर्ष भर के भीतर ही 'आप' के दर्जन भर विधायक जेल हो आए. आज भी दिल्ली में नित नए खुलासों का दौर जारी है. इतना ही नहीं कांग्रेस के भ्रष्टाचारों की बखियां उधेड़ने वाले मोदी कैबिनेट के 24 मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. शिवपाल यादव की चिट्ठी पर नियुक्ति को लेकर स्वयं मोदी घिरे हुए हैं. ऐसे में, यदि इरोम ने चुनाव जीत भी लिया तो वे मणिपुर से आफ्सपा हटाने में कितनी कामयाब हो पाएंगी, यह तो वक्त ही बताएगा.
फिलहाल, इरोम के फैसले ने अहिंसात्मक आंदोलन हो या संघर्ष का रास्ता अपनाने वाली जनता दोनों को ही सरकार कितनी गंभीरता से लेती है इस पर सोचने को मज़बूर कर दिया है. साथ ही इरोम का यह कदम तथाकथित बुद्धिजीवियों के समक्ष यह यक्ष प्रश्न भी खड़ा करता है कि मौजूदा वक्त में 'लोक' सर्वोपरि है या सरकार ही अब सबकुछ बनकर रह गई है! क्या जनता के चुने प्रतिनिधि अब सिर्फ अपने सिस्टम में शामिल लोगों की ही सुनते हैं! हालांकि, "आप" की सियासत समझने की कोशिश करें, तो इस सच की अनदेखी नहीं की जा सकतीकि राजनीतिक सिस्टम का हिस्सा बनने के बाद सभी एक सा वर्ताव करने लगते हैं. खैर, सच चाहे जो भी हो, इरोम का अनशन समाप्ति का फैसला स्वागत योग्य है और लोकतंत्र की हार- जीत से इतर उनका संघर्ष अभिनंदनीय है. 'आयरन लेडी' के जज्बे को सलाम.
Subscribe to:
Comments (Atom)

